Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 25, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 25, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
सर्वं जगद्गतं दृश्यं बोधमात्रमिदं ततम् ।
स्पन्दमात्रं यथा वायुर्जलमात्रं यथार्णवः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
ऐसी स्थिति मे (जगत् बोधरूय ही है, ब्रोधानतिरिक्त (बोधरूप) प्रकाशवाला होने से जो
जिससे अनतिरिक्त (अभिन्न) ग्रकाशवाला होता है, वह तद्रूप ही होता हैं, जेते वायु का स्पंदन
वाबुरुप होता €“ यह अनुमान फलित हुआ, यह कहते हैं ।
जैसे वायु स्पन्दनरूप है और समुद्र जलरूप है, वैसे ही समस्त जगत् में स्थित यह समस्त
विस्तृत दृश्य भी बोधरूप ही है