Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 25, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 25, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
यदा त्वेषा नु दृश्यश्रीर्बोधमात्रैकरूपिणी ।
तदान्येवाप्यनन्यैव सती बोधेन बोध्यते ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
अपने सिद्धान्त में तो दोष नहीं है, यह कहते हैं ।
यद्यपि अपने सिद्धान्त से यह दृश्यप्रपंच एकमात्र बोधरूप अतएव बोध से अनन्य ही सिद्ध है,
तथापि अज्ञान के कारण अन्य के सदृश होकर बोध से प्रकाशित होता है