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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 25, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 25, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

अस्याः संसारसल्लक्या वासनोत्सेधकारिणी । कदल्या वनजालिन्या रसलेखेव माधवी ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

वासना ही आगे का संसार भी बनाती है, यह कहते हैं । जिस प्रकार वसन्त ऋतु की रसलेखा वन में फैलनेवाली कदली का विस्तार करती है, उसी प्रकार इस संसाररूपी कण्टकपूर्ण गुल्म का वासना ही विस्तार करती है