Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 25, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 25, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
संसारान्ध्यतयोदेति वासनात्मा रसश्चितौ ।
यथा वनतया तस्थौ मधुमासरसः क्षितौ ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे पृथ्वी में
मधुमास का रस वन बनकर स्थित रहता है, वैसे ही चिति में (अज्ञानाश्रय जीव-चैतन्य मे)
वासनारूपी रस संसाररूप अन्धकार बनकर उदित होता है