Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 26, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 26, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 26 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
सदिवासत्यमेवेदमकुर्वत्यन्यमेधते ।
मृदा हेम्नेव कुम्भत्वमपृथग्लभ्यमात्मगम् ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
यह जगत असल में असत्य है, परन्तु
सत्य की नाई प्रतीत होता है, वास्तव में ब्रह्मचिति अन्यका निर्माण न करती हुई यों ही जगत-रूप
में स्फुरित होती है। जगत् असत्य है, इसमें दृष्टान्त यही है कि जैसे मिट्टी या सोने में कल्पित घडा
या कड़ा मिट्टी या सोने से अलग करके प्राप्त नहीं किया जा सकता, वैसे ही आत्मा मेँ कल्पित यह
जगत् आत्मा से अलग करके प्राप्त नहीं किया जा सकता। यदि जगत् सत्य होता, तो आत्मा से
अलग होकर उपलब्ध होता