Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 26, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 26, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 26 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
असदेव जगत्साहं शुद्धा संवित्तनोति खे ।
ईषत्प्रसरणेनाशु स्पन्दनं पवनो यथा ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, जैसे पवन शीघ्र स्पन्दन का विस्तार करता है, वैसे
ही विशुद्ध संवित् अविवेकजनित कुछ साधारण स्फुरणरूप व्यापार से अज्ञातस्वस्वरूप चिदाकाश
में अहंकारयुक्त असद्रूप जगत का विस्तार करती है