Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 26, Verse 28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 26, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 26 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
सर्वेषामेव भावानां चिदाकाशात्मनामपि ।
मिथ्यैव स्वप्नशैलानामिव पार्थिवता स्थिता ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वप्नपर्वत की नाई फार्थिव विष्य भी पार्थिवरुप नहीं है, यानी भिथ्या हैं यों भावना करनी
चाहिए, यह कहते हैं।
जितने पदार्थ हैं, वे सब यद्यपि परमार्थ में चिदाकाशरूप ही हैं, तथापि उनमें स्वप्न के पदार्थ
के सदृश पार्थिवरूपता मिथ्या ही स्थित है