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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 26, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 26, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 26 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

चित्तमान्ध्याय वृत्तान्तद्रुमैर्गहनवत्स्थितम् । रसरञ्जनया लोके वसन्त इव काननम् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

भावना में मूल कारण रागादि दोषें से द्ृषित, पक्की कासनाओ से भरा विवेक शून्य वित्त हैं, यह आशय लेकर कहते हैं । लोक में यह चित्त एक तरह से वसन्तकाल का भयंकर अरण्य है, अनेक तरह के वृत्तान्तरूपी वृक्षों को लेकर अन्धकार पैदा करने के लिए गहन-सा बन स्थित है, राग आदि दोषरूपी जल से सींचा भी गया है