Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 26, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 26, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 26 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
अहो बत विचित्राणि वासनावशतोऽवशैः ।
भूतकैरनुभूयन्ते सुखदुःखानि जन्मसु ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
अहो, महान् आश्चर्य है कि वासना के बल से पराधीन होकर ये अज्ञानी भूत सब चित्रविचित्र
सुख-दुःखों का जन्मों में अनुभव करते हैं