Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 26, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 26, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 26 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
निर्वाणो निर्मना मौनी कर्ताऽकर्ता च शीतलः ।
ज्ञ एव शान्त एवास्ते शून्य एवाभिपूरितः ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
कतरिप आत्मा वास्तव में चारों ओर से जब
परिपूर्णभाव से लक्षित हो जाता है, तब शान्त ही रहता है । उसमें किसी प्रकार का उपद्रव
नहीं है वह शून्य, मोक्षरूप, मनरहित, मौनी, अकर्तारूप और शीतल है