Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 26, Verse 32

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 26, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 26 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

निर्वासनास्पन्दपरो यन्त्रपुत्रकगात्रवत् । स यथास्थितमेवास्ते ज्ञः संव्यवहरन्नपि ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे किसी यन्त्र से बनाई गयी प्रतिमा वासनाशून्य होने के कारण स्पन्दनशून्य है, यानी स्पन्दन के अभिमान से रहित है, वैसे ही आत्मा भी वास्तव में वासनाशून्य होने के कारण स्पन्दनशून्य ही है । अतः व्यवहार कर रहा भी ज्ञानी अपने असलरूप में ही स्थित रहता है