Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 26, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 26, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 26 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
पार्थिवत्वे शरीरेऽस्मिन्स्वस्वप्नाङ्ग इवासति ।
भ्रममात्रात्मनि कुतः क्व कस्य किमपेक्षणम् ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
किससे, किसकी इच्छा हो सकती है ?