Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 26, Verse 41
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 26, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 26 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
तत्राद्ययावत्पाषाणसमधर्मा स तिष्ठति ।
संशान्तकरणो योगी बोध्यमानः प्रबुध्यते ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
आज भी उस पर्वत पर पाषाण के सदृश
निश्चल होकर वह स्थित है । उसके चक्षु आदि समस्त करण शान्त हो चुके हैं । कदाचित् दूसरों
द्वारा जगाये जाने पर वह योगी समाधि से बाहर भी हो जाता हे