Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 26, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 26, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 26 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
आह्लादिनो मृतवतः शुद्धस्यालोककारिणः ।
शीतलस्याखिलार्थेषु ज्ञस्येन्दोश्च किमन्तरम् ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
यही कारण है कि संस्रार- भ्रम को तैर गये तत्ववेत्ता पुरु छुखी रहते हैं; यों उनकी प्रशसा
करते हैं /
भद्र, ज्ञानी और चन्द्र इन दोनों में क्या अन्तर है ? कुछ भी नहीं, क्योकि ज्ञानी पुरुष भी आह्वाद
देनेवाला है, अमृत से पूर्ण है, शुद्ध है, ज्ञानरूप प्रकाश करता है और सभी अर्थो में शान्त है