Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 27, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 27, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 27 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
सर्वमेकमिदं शान्तं ब्रह्म बृंहितवेदनात् ।
न किंचिज्जगदाद्यस्ति भ्रान्तिरन्या न विद्यते ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्मद्रष्टि सेतो सव एक ही हैं; यह कहते हैं ।
आत्मतत्त्व के ज्ञान से तो यह सब केवल शान्त ब्रह्मस्वरूप ही है, दूसरा जगत् आदि पदार्थ
कुछ भी नहीं है, और न कोई दूसरी भ्रान्ति ही है