Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 27, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 27, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 27 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
न विद्यते यथा व्योम्नि वनं स्नेहश्च सैकते ।
विद्युच्छशाङ्कबिम्बे च तथा देहादि चेतसि ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी, जैसे आकाश में अरण्य नहीं
रहता अथवा जैसे बालू में तेल नहीं रहता या जैसे चन्द्रबिम्ब में बिजली नहीं रहती, वैसे ही चित्त में
देह आदि कुछ नहीं रहते