Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 27, Verse 19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 27, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 27 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
यथास्थितं वस्त्वधिगम्य राम स्थितोऽसि चेद्वा स्वकुलाम्बरेन्दो ।
तद्धर्षशोकैषणदूषणादि विमुच्य वा तिष्ठ यथेच्छमास्व ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
तत्वज्ञान के बाद यदि प्रमाद हो जाय या प्रबल प्रारब्ध र जाय, तो उससे हर्ष-शोक भी होते
रहेंगे और उनके कारण फिर संसार भी होगा ही ? इस पर नहीं, यह उत्तर देते हैं /
हे अपने कुलरूप आकाश के चन्द्रमा श्रीरामजी, यदि आप ब्रह्मात्मा की एकतारूप वस्तु
को भलीभाँति जानकर अवस्थित हैं, तो चित्त में सन्ताप पहुँचानेवाले हर्ष शोक, इच्छा आदि
दोषों को छोडकर रहिये या उनका अनुसरण करते रहिये, आपको फिर संसार आ ही नहीं
सकता