Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 27, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 27, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 27 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
आपत्सु संपत्सु भवाभवेषु शान्तैषणाहर्षविषादसंवित् ।
सौम्यादहंभावविदा विमुक्तो यथास्थितं तिष्ठ विलीय मास्व ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी, अब आप मेरे सौम्य उपदेश से अहंकार से पहले अलग
हो जाइए, फिर सम्पत्तियों में इच्छा, हर्ष और आपत्तियों में विषाद से रहित हो जाइए, वैभवों के
उत्कर्ष और अपकर्ष में (बढ़ने-घटने पर) भी एक-से रहिए। कभी भी मेरे उपदेश का विस्मरण कर
यानी अपने स्वरूपस्थिति की दृढता का परित्याग कर स्थिर मत बैठिये