Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 27, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 27, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 27 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
स्थाल्युदञ्चनकुम्भादि यथा मृन्मात्रकं तथा ।
चित्तमात्रं जगदिदं क्षीणं तच्च विचारणात् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
थाली, पुरवा, घड़ा आदि जैसे केवल मिट्टी ही है, वैसे ही यह जगत् केवल चित्त ही है। यह विचार
से तो क्षीण हो चुका है