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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 27, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 27, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 27 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

स्फुरन्ति हि जडक्रीडाश्चिच्चमत्कारचापलात् । अचापलात्प्रतीयन्ते तरङ्गा इव वारिणि ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

भद्र, चिति के चमत्काररूप इस चंचल मन की एकमात्र चपलता के कारण ही ये सब जड़ संसार के खेल स्फुरित होते हैं और उसकी चंचलता न रहने से आत्मा में ऐसे दिखाई पड़ते हैं, जैसे जल में तरंग