Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 27, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 27, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 27 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
यथा शुभ्राम्बुदे वस्त्रशङ्का न फलभागिनी ।
देहोऽयमहमित्येषा तथा शङ्का न वास्तवी ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, शुभ्र मेघों
में कल्पित वस्त्ररूपता वस्तुतः जैसे पहनने के काममें नहीं आती, वैसे ही इस देह में कल्पित
आत्मरूपता भी वस्तुतः कुछ काम में नहीं आती