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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 27, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 27, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 27 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

माऽवस्तुनि निमग्नस्त्वं भव भूरिभवप्रदे । वस्त्वनन्तसुखायाद्यं भव्यं भावय भूतये ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरामजी, आप अनेक तरह के प्रपंच को देनेवाली अवस्तु में यानी मिथ्या पदार्थों में डूबिये मत। मुख्य भव्य अनन्त वस्तु की मुक्तिरूप अनन्तसुख के लिए उपासना कीजिए