Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 28, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 28, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
स्पन्दात्संविज्जगद्वीजमस्पन्दाद्यात्यबीजताम् ।
अङ्कुरश्च तदेवान्तः स्थितत्वादङ्कुरश्रियः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
स्पन्दन
के कारण ही संवित् जगत् की बीज हो जाती है ओर स्पन्दन के प्रभाव से अबीजरूप हो जाती
है । उसीके अन्दर सूक्ष्मरूप से अंकुर श्री भी स्थित है, अतः वही बाहर निकलकर स्थूल
अंकुररूप हो जाती है