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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 28, Verse 12

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 28, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

चित्त्वं च क्वचिदस्पन्दं क्वचित्स्पन्दं स्वभावतः । अनन्तमेकार्णववद्दिक्कालक्रमसंस्थितम् ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

असीम चित्स्वभाव ही ऐसा है कि कहीं पर अपने स्वभाववश देश- काल क्रम में स्थित स्पन्दन से शून्य हो जाता है और कहीं पर स्पन्दनरूप बन जाता है