Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 28, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 28, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
चित्स्फुरन्ती भूमिकोशे करोति स्थावराङ्कुरम् ।
स्थूलान्सूक्ष्मान्मृदुक्रूरान्पयोबुद्बुदकानिव ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
स्पन्दनशील हो रही चिति ही भूमि में
वट आदि वृक्षों के अंकुर को स्थूल पदार्थ, सूक्ष्म पदार्थ, कठिन पदार्थ एवं मृदु पदार्थ जल में
बुलबुलों की नाई बनाती है