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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 28, Verse 20

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 28, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 20

संस्कृत श्लोक

जङ्गमानां स्थावराणामेतदाद्यं च बीजकम् । संविद्विस्फुरणामात्रमस्य बीजं न विद्यते ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

भद्र, स्थावर तथा जंगम पदार्थों का यही एक आदिम संवित्स्फुरण कारण है। और इसका कोई कारण नहीं है