Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 28, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 28, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
मनागपि न भेदोऽस्ति संवित्स्पन्दमयात्मनोः ।
कल्पनांशादृते राम सृष्टौ पुरुषकर्मणोः ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
अतएव चिति का स्यन्दन ही पुरुष आदि आकाररूप हैं और वितिरमे स्यन्दन की ।निवृवत्ति ही
निराकारता हैं, ऐसी स्थिति में विमर्श करने पर स्यन्द और पुरुष में कड भेद नहीं है, यह कहते हैं
श्रीरामजी, इस सृष्टि मे संवित् ओर संवित्-स्पन्दमय पुरुष एवं कर्म (स्पन्द) दोनों मे कल्पानांश
को छोड़कर तनिक भी भेद नहीं हे