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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 28, Verse 7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 28, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

जलवीच्योर्यथा द्वित्वं संकल्पोत्थं न वास्तवम् । तथेह चित्परिस्पन्दरूपयोर्जन्तुकर्मणोः ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

भद्र, जैसे संकल्प से जनित जल ओर तरंग का भेद वास्तविक नहीं है, वैसे ही संकल्पजनित पुरुष और कर्म का (संवित्स्पन्दनका) भेद नहीं है