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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 29, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । नित्यमन्तर्मुखस्तिष्ठ वीतरागो विवासनः । चिन्मात्रममलं शान्तं कर्म सर्वत्र भावयन् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्री रामभद्र, शत्रु, मित्र आदि सबके लिए प्रारब्ध से जो कुछ कार्य आ जाय, उसे यथायोग्य करते हुए भी आप निरन्तर अन्तर्मुख ही रहिए। राग छोड़ दीजिए, वासनाओं से परे हो जाइए ओर सर्वत्र निर्मल शान्त चैतन्यमात्र की भावना कीजिए

सर्ग सन्दर्भ

अट्ठाईसवाँ सर्ग समाप्त उनतीसवों सर्ग व्यवहारकाल में जो भी कुछ कर्तव्य आ जाय उसे निभाते हुए अपने स्वरूप में सदा स्थिर रहना चाहिए, यों रामजी के प्रति महाराज वसिष्ठजी का उपदेश ।