Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 29, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
आकाशविशदः प्राज्ञश्चिन्मात्रैकघनस्थितिः ।
समः सौम्यः समानन्दः स ब्रह्माऽऽबृंहिताशयः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, आकाश के सदुश विशद हो जाइए । प्राज्ञ बनिए । एक चिन्मात्र में अपनी दृढ स्थिति
(निष्ठा) बनाइए । सम, सौम्य एवं पूर्णानन्द से युक्त हो जाइए तथा अपने अन्तःकरण को
ब्रह्मसदृश आनन्दरस में सराबोर कीजिए