Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, Verses 3–4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 29, verses 3–4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 3,4
संस्कृत श्लोक
शोकेष्वापत्सु घोरेषु संकटेष्ववटेषु च ।
यथाप्राप्तेषु सर्वेषु खर्वेषून्नतिमत्सु च ॥ ३ ॥
यथाक्रमं यथादेशं कुरु दुःखमदुःखितः ।
वाष्पक्रन्दादिपर्यन्तं द्वन्द्वयुक्तसुखानि च ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
रामजी, प्रारब्धवश प्राप्त हुए छोटे-बड़े शोक,
आपत्ति, घोर संकट, अवट (गर्त) आदि सभी प्रसंगो में भीतर दुखी होकर देशधर्मो के अनुसार
एवं क्रमानुसार रुदन-अश्रुपात आदि पर्यन्त दुःखों का ओर शीतोष्ण आदि से युक्त वस्त्रादिभोगरूप
सुखों का अनुभव करते चलिए