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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, Verse 11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 29, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

अन्तर्मुखः सदानन्दः स्वात्मारामतयान्वितः । यः करोति शमोदारस्तत्र कर्तासि नानघ ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

कुछ करने पर म्रूढ़जनों को तो दोष लगता है, परन्तु जानी पुरुष को कुछ करने पर दोष नहीं लगता, यह कहते हैं। हे अनघ, जो पुरुष अपनी वृत्तियों को आत्मा के अन्दर लगाकर स्थित रहता है, सदा आनन्द में मग्न रहता है, अपनी आत्मा में ही आराम करता है तथा जो शान्ति ओर औदार्य से युक्त है, वह कर्ता नहीं होता, इसलिए पूर्वोक्त विषयों में आप कभी कर्ता नहीं होंगे और न उनसे आपको दोष ही लगेगा