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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, Verse 23

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 29, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 23

संस्कृत श्लोक

सुषुप्तसमया वृत्त्या जाग्रद्व्यवहरन्व्रजन् । गृहाण मा किंचिदपि मा वा किंचित्परित्यज ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

जागते हुए, व्यवहार करते हुए या जाते हुए भी आप सोये हुए पुरुष के सदृश वृत्ति के कारण न तो अभीष्ट का ग्रहण करें या न अनिष्ट का परिहार ही करं