Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 29, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
किमर्थं भगवंस्तूष्णीं भवानहमिव स्थितः ।
न सोऽस्ति जगतां न्यायः सतां यो नोत्तरक्षमः ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
अक गुरुजी के पास उत्तर देने की युक्ति रही ही नहीं; यों मान रहे श्रीरामभद्र कहते हैं /
भगवन्, मेरे-जैसे आप चुपचाप क्यों स्थित हैं ? जगत् में शिष्यों का ऐसा कोई तर्क ही नहीं है,
जो विद्वान गुरुओं के लिए उत्तरयोग्य न हो