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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, Verses 35–36

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 29, verses 35–36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 35,36

संस्कृत श्लोक

यावान्कश्चित्किलोल्लेखो वाङ्मयो वदतां वर । सूक्ष्मार्थः परमार्थो वा बहुरल्पतरोऽपि वा ॥ ३५ ॥ प्रतियोगिव्यवच्छेदसंख्यातीतादिविभ्रमैः । स च सर्वोऽन्वितः साधो भा इव त्रसरेणुभिः ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

हे वक्ताओं में श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी, यह जितना वाणीरूप भाषण है, वह चाहे सूक्ष्म अर्थवाला हो, चाहे परम अर्थवाला हो, चाहे थोड़ा हो अथवा अधिक हो, परन्तु हे साधो, वह सब प्रतियोगी, भेद, संख्या, मुख्यभूत अर्थ, साधन, वाचन बोध, प्रमाण आदि की कल्पनाओं से ऐसे मिला-जुला रहता है जैसे जालो के अंदर सूर्यकिरणें त्रसरेणुओं से (सूक्ष्म रजकणों से) मिली-जुली रहती है