Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, Verse 38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 29, verse 38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
यथाभूतं च वक्तव्यं ज्ञस्यान्तेवासिनो मया ।
यथाभूतं विदुः काष्ठमौनमन्तविवर्जितम् ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
हे भद्र, ज्ञानी शिष्य के सम्मुख मुझे जो यथावत् सत्य
है, उसे ही कहना चाहिए, परन्तु समस्त कलंकों से निर्मुक्त यथावत् सत्य तो काठ की तरह मौन
ही है