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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, Verse 57

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 29, verse 57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 57

संस्कृत श्लोक

संकल्पः स्वप्नदृश्येऽन्तः संविन्मात्रात्मतां विना । यथान्यवद्भवेद्भूपास्तथैवास्मिन्बहिर्गते ॥ ५७ ॥

हिन्दी अर्थ

इस तरह केवल अन्तर्मुखतामात्र से स्वतः प्रिद्ध मुक्ति का उपपादन कर अब बर्हिमुखतामात्र से ही जगत्‌ का विस्तार होता हैं, इसका उपपादन करते हैं / है श्रोतागण भूपसमूह, जैसे स्वप्न के संसार में चेतनगत तत्‌-तत्‌ वासनानुसारी संकल्प चेतनरूप होता हुआ भी चेतनरूपताका परित्याग कर चेतनभिन्न प्रतीत होता है, वैसे ही यह आत्मा जब बहिर्मुख होता है, तब वही प्रपंचरूप होकर अन्य जड़ के सदृश भासने लग जाता है