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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, Verse 58

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 29, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 58

संस्कृत श्लोक

मनोबुद्ध्यादयश्चैते संविन्मात्रानुरूपिणः । मनोबुद्ध्यादिशब्दार्थभावितास्तु जडात्मकाः ॥ ५८ ॥

हिन्दी अर्थ

इसी तरह ये जो मन, बुद्धि, अहंकार आदि हैं, वे सब अन्तर्मुखदशा में चेतनरूप हैं और मन, बुद्धि आदि शब्दार्थो मेँ भावना करने पर यानी बहिर्मुखदशा में चेतनभिन्न जड़रूप हैं