Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, Verse 66
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 29, verse 66 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 66
संस्कृत श्लोक
ज्ञत्वेन ज्ञत्वमासाद्य मुनिर्भवति मानवः ।
अज्ञत्वादज्ञतामेत्य प्रयाति पशुवृक्षताम् ॥ ६६ ॥
हिन्दी अर्थ
जब यूलअज्ञान रहता है तभी उसके बल से बाह्य अर्थो के अज्ञान यूर्खता के सम्पादक
होते हैं। यूलअज्ञान का नाश हो जाने पर तो बाह्य अर्थो के अज्ञान युनित्व के सम्पादक हो
जाते हैं; इस आशय से कहते हैं /
आत्मज्ञान के द्वारा सांसारिक पदार्थों का अज्ञान प्राप्तकर पुरुष मुनि बन जाता है, परन्तु आत्मा
के अज्ञान द्वारा सांसारिक पदार्थों का अज्ञान प्राप्त कर पुरुष पशु तथा वृक्ष बन जाता है