Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, Verse 65
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 29, verse 65 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 65
संस्कृत श्लोक
अजडानां यदज्ञानं स्थाणूनामिव शाम्यताम् ।
तमाहुर्मोक्षमक्षुब्धमासितं पदमक्षयम् ॥ ६५ ॥
हिन्दी अर्थ
क्या युक्त पुरुष जगत् को जानते हैँ या नहीं 2 यदि जानते हैं; तो सारी और युक्त दोनों में
क विशेष नहीं रहा / दूसरे पक्ष में यानी नहीं जानते हैं; तो इस पक्ष में एक आत्मा के अज्ञान का
परिहार करते हुए आपने जयत् के अनन्त अज्ञान स्वीकृत कर लिये / घूखे काठ के जेते स्थित उन
पुरुषो में गुक््तत्व ही कैला ? इस पर कहते हैं ।
अनावृत स्वप्रकाश निरतिशयानन्द आत्मा के स्वरूपभूत हुए उन मुक्त पुरुषों की सांसारिक
ज्ञानों से रहित दुःखरूप क्षोभ से शून्य जो स्थिति है वही मोक्ष है ओर वही अविनाशी पद है । इनमें
अनन्त अज्ञानों की आपत्ति भी नहीं है, क्योंकि एक ही के विज्ञान से सभी का ज्ञान हो जाने के
कारण उनमें किसी तरह के अज्ञान की प्राप्ति ही नहीं है ओर भ्रमात्मक ज्ञान का अभाव भी
आत्मरूप ही है, इसलिए उसमें तत्त्वज्ञान से कोई विलक्षणता ही नहीं रही