Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, Verse 64
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 29, verse 64 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 64
संस्कृत श्लोक
जीवानां ज्ञप्तिगुप्तेन ज्वलन्नज्ञानवायुना ।
अविद्याग्निः प्रबुद्धानां पुनस्तेनैव शाम्यति ॥ ६४ ॥
हिन्दी अर्थ
क्या जीवों की अविद्या को चिदात्मा नष्ट कर देता है या जड़ ? प्रथम पक्ष तो युक्त नहीं
है, क्योंकि चिदात्मा तो अविद्या का साधक है, इसलिए उससे विरोध ही नहीं / दूसरा पक्ष
भी युक्त नहीं है, क्योंकि सारा जड़ अविद्या का कार्य हैं, इसलिए अविद्या का जड़ भी विरोधी
नहीं है, इस आशंका पर कहते हैं /
"मैं अज्ञानी हूँ", इस प्रकार का साक्षी ज्ञान ही अज्ञान की सिद्धि करता है । यद्यपि जीवों
की संसाररूप अविद्यात्मक अग्नि भें संसारी हूँ” इस तरह से साक्षिज्ञान से रक्षित अज्ञानरूप
वायु से जलती रहती है तथापि भँ ब्रह्मस्वरूप हूँ” इस तरह के प्रबुद्ध जीवों की अन्तिम
साक्षात्कार वृत्तिरूप में परिणत साक्षि-रक्षित अज्ञानवायु से मानों नष्ट हो जाती है, तीसरे
किसी की अपेक्षा नहीं करती