Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, Verse 63
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 29, verse 63 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 63
संस्कृत श्लोक
इति निश्चयवानन्तस्तज्ज्ञोऽज्ञ इव संज्ञया ।
चिद्वपुर्विद्यमानोऽपि शाम्यत्यसदिव स्वयम् ॥ ६३ ॥
हिन्दी अर्थ
यह
चिदाकाशरूप ही मैं हूँ, इस प्रकार के निश्चय से युक्त जो भी दूसरा पुरुष है वह तत्त्वज्ञ ही है। वह
व्यवहार से अज्ञानी के सदृश विद्यमान होता हुआ भी चैतन्यस्वरूप ही है और देहादि की स्थिति
होने पर भी उन्हें असत्-सा मानकर स्वयं शान्त ही रहता है