Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, Verse 73
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 29, verse 73 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 73
संस्कृत श्लोक
न दुःखमस्ति न सुखं न पुण्यं न च पातकम् ।
न किंचित्कस्यचिन्नष्टं कर्तुर्भोक्तुरसंभवात् ॥ ७३ ॥
हिन्दी अर्थ
जब आत्मा में कर्तृत्व- भोक्तृत्व की सत्ता हो, तब तो समस्त छुख-दुःख के भोग के लिए
पुण्य-पाप की व्यवस्था हो सकती हैं / आत्मा में जब कर्तृत्वि-भोक्तृत्व का सभव ही नहीं; तब
पुण्य-पाप की व्यवस्था ही क्या 2 इस पर कहते हैं /
कर्तृत्व और भोक्तृत्व का ही जब आत्मा में असम्भव है तब न दुःख है, न सुख है, न पुण्य है,
न पाप है और न किसी का कुछ बिगड़ा ही है