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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, Verse 76

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 29, verse 76 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 76

संस्कृत श्लोक

शान्तत्वे चित्तत्वे नानानानात्मनीह शिवे । अवयविनोऽवयवित्वे त्विह युक्तिर्विद्यते नान्या ॥ ७६ ॥

हिन्दी अर्थ

इस तरह मायिक विवर्तवाद के सिद्धान्त को लेकर आरोपित जग्रत्‌ के अपवाद से तत्त्ववेत्ता पुरुष की परमपुरुषार्थ में निष्ठा बतलाई परन्तु दूसरे तार्किक जो दुदे-दुदे प्रिद्धान्त की कल्पना करते हैं उनके पास जयत्‌ के उत्पत्ति आदि व्यवहार में एवं परम पुरुषार्थरुप परमार्थ में कड युक्ति नहीं है, यह कहते हैं । भद्र, यह शिवस्वरूप जो अन्तरात्मा है वह प्राण, बुद्धि, मन, देह आदि के साथ एकरूप बनकर अनेकरूप भिन्न स्वभाव तथा संसार के अनेक अर्थो से आक्रान्त प्रत्यक्षतः दिखाई देता है, इस आत्मा में दिखाई दे रही अनेकरूपता, भिन्न स्वभावता आदि का निराकरण कर दुःखरहित निरतिशय अद्वितीय आत्मा मेँ आनन्दरूपता बचानी है | इसमें अध्यारोप अपवादप्रणाली को छोडकर दूसरी कोई युक्ति है नहीं । कल्याणरूप अन्तरात्मा को सदा शान्तस्वरूप माना जाय, तो भी निर्विकार अन्तरात्मा का-संचलन एवं परिच्छिन्न स्वभावयुक्त चित्तस्वरूपता धारणकर देह, इन्द्रिय आदि अनेक-अनेक तरह के भावों द्वारा-जो संसार में आना है, इसमें अध्यारोप अपवादप्रणाली को छोडकर किसी के पास और कोई युक्ति नहीं है । इन सब बातों को सिद्ध करने के लिए आत्मा को परिच्छिन्न, परिणामी एवं सावयव मान लिया जाय, तो भी इस आत्मा को जिन अवयवो को लेकर सावयव स्वीकार करेगे, इसमें कोई युक्ति नहीं मिलेगी, क्योकि यदि अवयवो को चेतनरूप मानेंगे, तो कभी उनका एकमत न होगा, ऐसी स्थिति में अवयवो का विच्छेद हो जाने के कारण अवयवी का विनाश ही प्राप्त है यदि अवयवों को जड़ मानेंगे, तो अवयवी भी जड़ हो जायेगा । ऐसी स्थिति में अनित्य आत्मा पूर्व के पुण्य-पापों का भोग कैसे करेगा ? इसी तरह आत्मा को जगत्‌ का कारण मानकर शान्त एवं निर्विकार कोई मान ले, तो भी इसकी जगत्‌ बनाने में अनुकूल संकल्पात्मक चित्तरूपता आदि मेँ अध्यारोप अपवाद को छोडकर ओर कौन-सी युक्ति हो सकती है ? इसलिए विवर्तदुष्टि ही एकमात्र सब वादियों के लिए शरण है