Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, Verse 77
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 29, verse 77 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 77
संस्कृत श्लोक
अर्थागतस्वभावस्य च नैव च संभवादमले ।
एतस्मिन्सर्वगते ब्रह्मणि नास्ति स्वभावोक्तिः ॥ ७७ ॥
हिन्दी अर्थ
से विचित्रता का नाम ही उठ जायेगा । सर्वसाधरण धर्म में न तो विचित्रता रहती है और न वह किसी
का पार्थक्यकारक ही होता है । ऐसी स्थिति में सम्पूर्ण जगत् की एकरूपता हो जायेगी