Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, Verse 78
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 29, verse 78 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 78
संस्कृत श्लोक
न च नास्तिकोपलम्भात्संवित्तेरस्तिता च नैवाजे ।
ग्राह्यग्राहकदृष्टेरसंभवादस्ति किंचिदपि ॥ ७८ ॥
हिन्दी अर्थ
सवके अनुभव पर बढ़ी हुई जयत्-विवित्रता का यदि युक्ति के अभाव में आप खण्डन करते
हैं. तो ज्ञान का भी आप खण्डन क्यों नहीं करते, क्योकि जेय के बिना ज्ञान तो कहीं होता नहीं ।
ऐसी स्थिति में शून्यवाद ही आ गया, इस पर कहते हैं /
विषयों के खण्डन के प्रसंग में जो पुरुष यह कहता है कि ज्ञान का भी अस्तित्व नहीं है,
वह अत्यन्त तुच्छ है, क्योकि ज्ञान के अस्तित्व का खण्डन करनेवाला जो पुरुष है, वह अपने
आपका ज्ञान रखता है, इसलिये ज्ञान की सत्ता नहीं है, यह कैसे कह सकते हैं ? और खण्डन
करनेवाला पुरुष अपने से भिन्न ज्ञान और विषय का खण्डन करेगा, अपना तो करेगा नहीं,
जब सभी ज्ञान उसी की आत्मा है, तब स्वभिन्न विषय का खण्डन करते हुए वह ज्ञान को
आखिर बचा ही लेता है । जो निषेध किया जाता है वह किसी आधार पर ही किया जाता
है, निराधार निषेध नहीं किया जाता है । इससे ज्ञान करनेवाला एवं जानने योग्य विषय दोनों
का स्वयंप्रकाश, ज्ञाता और ज्ञेय से शून्य आधारभूत आत्मा में ही निषेध करना चाहिए, यही
उसकी आत्मा है। ऐसी स्थिति में अविनाशी स्वात्मा में ही ग्राह्म-ग्राहकदृष्टि के असम्भवप्रतिपादन
में पर्यवसान से खण्डनकर्ता के मत में समस्त प्रतिषेधों के आधारभूत कोई अज वस्तु सिद्ध
हो गई और यही वस्तु परब्रह्म है