Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 3, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 3, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 3 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
न यथा संनिवेशान्तः संनिवेशस्ततः पृथक् ।
तथा नभोर्थादि पृथङ् न परस्मान्मनागपि ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
भूलोक की रचना के
अन्तर्गत जम्बूद्वीप आदि की रचना जैसे भूमि से पृथक् नहीं है, वैसे ही चिदाकाश के अन्तर्गत सब
भूत ओर भुवन आदि सन्मात्र परब्रह्म चिदाकाश से तनिक भी पृथक् नहीं है