Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 3, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 3, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 3 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
यथा द्रवत्वं पयसि यथाऽऽलोकश्च तेजसि ।
तथा ब्रह्मण्यतद्भावं चित्त्वं चित्तं च विद्यते ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे जल में द्रवत्व और तेज में प्रभा ग्रहकत्व-स्मर्तृत्व धर्मों से शून्य है, वैसे ही ब्रह्म
में चित्त और चित्त ग्रहकत्व एवं स्मर्तृत्व धर्म से शून्य है