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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 3, Verse 38

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 3, verse 38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 3 · श्लोक 38

संस्कृत श्लोक

गेहमेवोपशान्तस्य विजनं दूरकाननम् । अशान्तस्याप्यरण्यानि विजना सजना पुरी ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

शान्त पुरुष के लिए घर ही निर्जन दूरस्थ जंगल है तथा अशान्त पुरुष के लिए निर्जन महान्‌ जंगल भी जनसमुदाय से ठसाठस भरी नगरी है