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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 3, Verse 41

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 3, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 3 · श्लोक 41

संस्कृत श्लोक

अनन्तसंकल्पवतो हृदयस्थजगत्स्थितेः । हृद्येवावर्तते भूमिरज्ञस्याखिलसागरा ॥ ४१ ॥

हिन्दी अर्थ

अनन्त संकल्पोँवाले तथा जगत्‌ की स्थिति को हृदय में रखनेवाले अज्ञानी के लिए सम्पूर्णं सागरो सहित सारी पृथिवी हृदय के अन्दर ही विराजमान है